घण्टियों का कारोबार प्रभावित

उत्तराखण्ड में देवी देवताओं को घँटीँ चढ़ाने का रिवाज सदियों पुराना है , जिसे लोग आज भी निभाते हुए आ रहे हैं, इसी रिवाज़ के चलते कुमाऊ में घण्टियों का कारोबार प्रतिवर्ष 10 से 12 करोड़ के पार चला जाता है , लेकिन कोरोना काल मे घण्टियों का कारोबार बिल्कुल शून्य हो गया, उम्मीद की जा रही है की नवरात्र में घण्टियों का कारोबार एक बार फिर से परवान चढ़ेगा ।
देव भूमि उत्तराखण्ड यानी देवताओं की भूमि, यहाँ के मंदिरों में 11वी शताब्दी में चंद राजाओ के दौर से ही घँटी चढ़ाई जाती रही हैं, कुमाऊ में प्रसिद्ध चितई गोलू मन्दिर, घोड़ाखाल मन्दिर, नैना देवी , लक्ष्मी माता मंदिर, गर्जिया देवी, माँ पूर्णागिरि धाम, कालीचौड माता और शीतला माता मंदिर में घँटी चढ़ाने लोग दूर दूर से आते हैं, पुरानी मान्यताओं के मुताबिक लोग वैवाहिक जीवन की शुरुआत करने, नौकरी से सेवानिवृत्त होने, या अन्य मनोकामना पूर्ण होने पर मंदिरों में घँटी चढ़ाते हैं ।
रिसर्च के मुताबिक घँटी हिन्दू धर्म की आस्था का प्रतीक है इसलिए लोग घँटी को घर से लेकर मन्दिर तक रखते हैं, जब घंटी बजाई जाती है तो वातावरण में कंपन पैदा होती है, जो वायुमंडल में दूर तक फैलती है। इस कंपन का फायदा यह है कि इसके क्षेत्र में आने वाले सभी जीवाणु, विषाणु और सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं , जिससे आसपास का वातावरण शुद्ध हो जाता है। जिन स्थानों पर घंटी बजने की आवाज नियमित आती है वहां का वातावरण हमेशा शुद्ध और पवित्र बना रहता है। इससे नकारात्मक शक्तियां समाप्त होती हैं और समृद्धि के द्वार खुलते हैं।
घण्टी कारोबारियों के मुताबिक घँटी का कारोबार पूरे साल भर चलता है लेकिन गर्मी और सर्दियों की छुट्टीयों के दौरान इनकी डिमांड और भी बढ़ जाती है, क्योंकि लोग देश विदेश से अपने गांव आकर मन्दिरो में पूजा अर्चना करते हैं और घँटीयां चढ़ाते हैं, अकेले हल्द्वानी और अल्मोड़ा के बाजार से घँटी का प्रति बर्ष करीब 1 से 2 करोड़ का कारोबार होता है , जबकि पूरे कुमाऊ से 10 से 12 करोड़ का, जिससे यह भी साबित हो रहा है की मन्दिरो में आस्था का सैलाब उमड़ रहा है, हल्द्वानी बाजार में 100 रुपये की कीमत से लेकर लाखो रुपये की कीमत तक की घण्टियाँ उपलब्ध हैं, नवरात्र नजदीक हैं लिहाज़ा उम्मीद की जा रही है की कोरोना काल के बाद घण्टियों का कारोबार अच्छी रफ्तार पकड़ सकता है