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उत्तराखंड,  विशेष खबर 

क्या बरकरार रहेगी गांवों की रौनक, पलायन थमेगा – जानिए कैसे


उत्तराखंड में 20 साल के लंबे अंतराल के बाद पलायन थामने के लिए चल रही कसरत उम्मीदें जगाने वाली है। पलायन के कारणों की जाँच सरकार अपने स्तर से पिछले 20 सालो से कर रही है लेकिन धरातल पर कुछ हुआ नहीं कई आयोग देहरादून में बैठकर चले गए किन्तु इस बीच कोरोना संकट ने भी प्रवासियों की घर वापसी की राह सुनिश्चित करने में मुख्य भूमिका निभाई। साढ़े तीन लाख से ज्यादा प्रवासी वापस लौटे, जिनमें ढाई लाख यहीं रुके हैं। कई प्रवासियों ने स्वरोजगार के क्षेत्र में हाथ आजमाए हैं और सरकार उन्हें हरसंभव सहयोग दे रही है। मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना समेत अन्य रोजगारपरक योजनाएं न सिर्फ प्रवासियों, बल्कि अन्य व्यक्तियों को भी संबल दे रही है। ऐसे में उम्मीद जगी है कि अब न सिर्फ पलायन का दाग धुलेगा, बल्कि गांवों में लौटी रौनक भी बरकरार रहेगी।
उत्तराखंड के गांवों से निरंतर हो रहे पलायन को थामने के मद्देनजर पूर्व में बातें तो खूब हुईं, मगर धरातल पर कोई ठोस पहल नहीं हो पाई। ये आधिकारिक आंकड़ा तक नहीं था कि वास्तव में कितने व्यक्ति यहां से पलायन कर चुके हैं। कोई डाटाबेस न होने के कारण योजनाएं भी नहीं बन पाईं। इस सबको देखते हुए मौजूदा सरकार ने राज्य में पलायन आयोग का गठन कर सबसे पहले पलायन की स्थिति और कारणों का पता लगाया। बात सामने आई कि राज्य गठन के बाद से अब तक 1702 गांव निर्जन हो गए। तमाम गांवों में जनसंख्या अंगुलियों में गिनने लायक रह गई है। सीमांत क्षेत्र के गांव भी खाली हो रहे हैं। आयोग की रिपोर्ट के अनुसार मूलभूत सुविधाओं जैसे शिक्षा स्वास्थ, रोजगार के साधनों का अभाव जैसे कारणों से गांवों से बेहतर भविष्य की तलाश में पलायन हो रहा है। कारणों का पता चलने के बाद पलायन को थामने के लिए विभागवार कार्ययोजनाएं बनाने की कसरत हुई, जिसके बेहतर परिणाम आए। काफी संख्या में रिवर्स पलायन हुआ और वापस लौटे प्रवासियों ने गांव में रहकर तरक्की की इबारत लिख डाली कुछ लोग बेहतर काम कर रहे है ।
पलायन आयोग के आंकड़ों पर ही गौर करें तो फरवरी से लेकर सितंबर तक राज्य में 357536 प्रवासी लौटे। हालांकि, अनलॉक की प्रक्रिया शुरू होने के बाद इनमें से 104849 फिर से वापस लौट गए। अलबत्ता, 252687 अभी गांवों में ही रुके हैं। अच्छी बात ये है कि इन प्रवासियों में 33 फीसद कृषि, बागवानी, पशुपालन, 38 फीसद मनरेगा, 12 फीसद स्वरोजगार और 17 फीसद ने अन्य स्रोतों से आजीविका पर निर्भर हैं।
प्रवासियों समेत अन्य व्यक्तियों को गांवों में रोजगार, स्वरोजगार के लिए प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न विभागों की स्वरोजगारपरक योजनाओं को एक छतरी के नीचे मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के अंतर्गत लाया गया है। बड़ी संख्या में राज्यवासी इसके जरिये जानकारी लेकर स्वरोजगारपक गतिविधियों से जुड़ रहे हैं। हालांकि, स्वयं का उद्यम खड़ा करने वालों की संख्या अभी कम है, लेकिन सरकार की कोशिश है कि अधिक से अधिक प्रवासी अपने कौशल के अनुरूप स्वरोजगारी बनें। इससे वे खुद के साथ ही अन्य व्यक्तियों को भी रोजगार दे सकेंगे। जाहिर है कि इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी। बस जरुरत है की मूलभूत सुविधाएं मिल जाये व रोजगार व धनोपार्जन के कुछ श्रोत आरम्भ हो

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