मन की शांति का सूत्र
जब से भी मनुष्य ने होश संभाला होगा, उसका मानसिक विकास (psychological evolution) हुआ होगा, तब से ही वो इस बात पर निरन्तर प्रयोग कर रहा है कि ये मन कैसे उसके हिसाब से चले, कैसे इसको नियंत्रित किया जाय ?
लेकिन न जाने कितने प्रयोग अब तक किये जा चुके हैं, न जाने कितनी विधियाँ खोजी जा चुकी हैं, पर मनुष्य आज भी उतना ही असहाय महसूस कर रहा है जितना कि पहले कर रहा था, जबकि उस समय इसकी सोच का दायरा बहुत छोटा था, इसके पास संसाधन बहुत कम थे, विज्ञान का इतना विकास नहीं था, और मन का इस तरह से चारों दिशाओं में फैलाव करने की ऐसी व्यवस्था भी नहीं थी। सबसे पहले हमें मन की कार्यप्रणाली (processing of mind) को समझना होगा। हम जो कुछ भी आज इस दुनियां में देख रहे हैं, पढ़ रहे हैं या सुन रहे हैं, ये सब हमारे मन की ही उपज है। विज्ञान का इतना आविष्कार (scientific innovation), सामाजिक सभ्यता का इतना विकास (development of civilized society) और यहां तक कि उन चीजों को भी मन ने खोज लिया जिनको इन आँखों से या इन इंद्रियों (human senses) से महसूस भी नहीं किया जा सकता था। कहने का अर्थ है कि, ये सारी प्रकृति हमारे मन की ही खोज है। और इस खोज के कारण ही आज हम अपने जीवन का निर्वाह कर रहे हैं। जरा सोचें कि अगर मेडिकल साइंस (medical science) ने इतनी तरक्की न कि होती तो क्या आज हम इतनी आसान जिंदगी जी रहे होते, या ओर किसी भी क्षेत्र में तरक्की की बात कर लें।
ये सब का सब मन का ही खेल है।
अब प्रश्न उठता है कि जब सब मन का ही खेल है और इतने आविष्कार,इतनी सुविधाएं, सुख मन के ही कारण हैं, तो फिर इस मन को कंट्रोल (mind control methods) करने की इतनी आवश्यकता अनंत समय से क्यों महसूस की गई और क्यों इतने प्रयोग, विधियाँ खोजी गई और फिर भी मन को मनुष्य नियंत्रित नहीं कर पाया ?
आपने कभी देखा कि बच्चे से लेकर बूढ़ा तक कहता है मेरा मन ये करने को है,ये खाने को हे, ये नहीं करने को है, उसको कैसे पता चल रहा है कि उसका मन ऐसा कर रहा है या कह रहा है, कोई और भी है उसके पास जो मन को देख रहा है, नहीं तो इसको कैसे पता चलता। इस मन को कौन देख रहा है?
होश (awareness) है जो इसको खबर दे रहा है कि मन ये मांग रहा है। सोचें ?
होश को हम remembrance कह लें, ध्यान (meditation) कह लें, द्रष्टा (watchfulness) कह लें, आत्मा (consciousness) कह लें, जो मर्जी नाम दे दें मग़र यह तय है कि कोई और भी है जो मन को देख रहा है। जिस तरह मन को सभी महसूस करते हैं अपने शरीर के अंदर उसी तरह ये होश भी है जिसको महसूस (feel) किया जा सकता है।
हम सभी का निजी अनुभव है कि पढ़ाई करते समय हम पूरे पेज को पढ़ जाते हैं और हमें पता ही नहीं चलता कि हमने क्या पढ़ा? हम कहते तो हैं कि मन नहीं लग रहा, मग़र हकीकत यह है कि मन के साथ remembrance या होश (awareness) नहीं है, जिसके कारण पढ़ी हुई चीज याद नहीं रही।
दूसरा उदाहरण लें, ये भी हम सब का अनुभव होगा, आप सुबह उठे बाथरूम में गए, लौटकर फिर बिस्तर में आ गए, अगर मैं आपसे पूछूं कि क्या आपको याद था कि आप उठे, आपके स्टेप ऐसे-ऐसे पड़े, आपने फिर बाथरूम के दरवाजे को धक्का दिया फिर आपने नल चलाया फिर आप वापस आये। ये सारे स्टेप जो भी आपने किये, आप पाएंगे कि सब auto पायलट mode में थे, आपको सब कुछ याद नहीं है लेकिन आपने अपना काम कर दिया। सुबह से लेकर शाम तक हम इसी तरह अपनी जिंदगी जीते हैं। यहां तक कि हम अच्छा खासा पैसा कमा लेते हैं, (lucrative earning) अच्छे -अच्छे पदों में जॉब करते हैं लेकिन सब ऑटो पायलट मोड में।
जिन्होंने भी इस दुनियां में मन की इस अवस्था को पहचाना, मेहनत की इससे ऊपर उठने की (beyond mind and matter), उन्होंने यही कहा कि मनुष्य सोया-सोया ही आता है और सोया-सोया (sleeping mode) ही चला जाता है। उन्होंने ही उपाय भी बताए, चाहे वो जीसस हों, बुद्ध हों, कृष्ण हों या नानक, सबने हमें तरीका बताया है।
अब भी लगता है कि प्रश्न वहीं खड़ा है कि इस मन को कैसे नियंत्रित करें (how to control the mind)?
ऊपर लिखी बातों से एक बात तो साफ हो चुकी है कि मन अकेला ही नहीं है बल्कि मन को देखने वाली ताकत जिसको होश या दृष्टा कहते हैं वो भी मनुष्य के अंदर ही है। मन एक बहुत ही शक्तिशाली कार्य करने का tool है हमारे अंदर। समझने की आवश्यकता यह है कि इसका उपयोग होश को साथ में रखकर किया जाय। जिससे कि हम इसका उपयोग भी कर लें और इसको कंट्रोल भी। जब भी हम इसको बिना होश के उपयोग करेंगे ये हमारे कंट्रोल से बाहर रहेगा और इसके हर कार्य का खामियाजा (repercussions of every action) भी हमें ही भुगतना होगा। ओर तभी प्रश्न उठता है इसको कंट्रोल करने का, हमें लगता है कि ये हमारा दुश्मन है, जबकि सच यह है कि हम बेहोशी से इसका इस्तेमाल कर रहे हैं और दुखी हो रहे हैं। इसलिए ये बात प्रचलित हो गई है कि मन को कंट्रोल करना है।
उदाहरण के तौर पर ,हम सभी आइंस्टीन (Einstein) के बारे में जानते हैं । जब उन्होंने खोज की उनकी खोज का मकसद ये नहीं था कि मानव जाति को परमाणु बम से उड़ा दिया जाय, जैसा कि आज हम सभी बारूद की ढेर पर बैठे हैं, पता नहीं कब कोई बेहोश मन बटन दबा दे और न जाने कितना नुकसान हो जाय। लेकिन उनकी खोज का, बेहोशी में, गुस्से में दुरुपयोग कर दिया गया तो वो बहुत दुखी हो गए, जो उनके अंत समय में कही बात से महसूस होता है। जब उनसे पूछा गया उनके अंतिम समय पर कि अगर आपको दुबारा मनुष्य जन्म मिले तो आप क्या बनना चाहेंगे? तो उन्होंने कहा एक बात पक्की है कि साइंटिस्ट नहीं बनना चाहूँगा, चाहे प्लम्बर बन जाऊँगा और लोगों की सेवा करूँगा। ये उनकी ऑटोबायोग्राफी में दर्ज है।
मुझे लगता है कि ये आदमी की जीवन भर की मेहनत उन लोगों के हाथ लग गयी जो होश में नहीं थे, परिणाम को नहीं जानते थे, उन लोगों ने उस आविष्कार का गलत प्रयोग कर दिया, जापान में गिराया गया एटम बम (Atom-bomb) इसका ही परिणाम है। ओर ऐसा ही डायनामाईट के आविष्कार के साथ भी हुआ जो खुद डायनामाइट ने अपने अंतिम दिनों में कही, उसका भी दुरुपयोग हो गया।
होश अगर मन के साथ नहीं है तो हम जो मर्जी कर लें हम खुश (happiness) नहीं हो सकते, हम आनंदित (blissful) नहीं हो सकते क्योंकि हम मन के साथ हैं ही नहीं । जैसे छोटे-छोटे प्रयोग करें- जो भी काम करें,बार-बार अपने से पूछें कि आप मन के साथ हो , उसको देख रहे हो। आप हैरान हो जाएंगे कुछ ही दिनों में ये देखकर की अब आप देख पा रहे हो कि मैं क्या सोच रहा हूँ, कैसे मेरे अंदर सोच उठ रही है और फिर वह सोच आपको कार्य करने को उकसा रही है। तब आप ये देख पाएंगे कि क्या ये सोच जो उठी है इसको कार्य तक पूरा करना है, या इसको उठने दो इसकी जरूरत नहीं है। तब आप पाएंगे कि आपके सारे वो काम जो आप कर बैठते थे क्योंकि आप होश में नहीं थे और बाद में दुख झेलते थे यहां तक कि कई बार तो इंसान को पूरी जिंदगी जेलों में गुजारनी पड़ती है, कई बार मृत्यु-दंड तक भुगतना पड़ता है। वो सब काम होने बंद हो गए हैं ।
जब ऐसा होगा तो आप समझते हैं कि कोई कभी भी किसी नशे का सहारा लेगा मन को रोकने के लिए, और होता उल्टा ही है, जिस भी ऐसी बाहरी चीजों को हम सहारा बनाते हैं हमें उसकी आदत पड़ जाती है और मन रुकना तो क्या, और भी ज्यादा सुस्त और बेहोश हो जाता है, उसकी सम्वेदनशीलता खत्म हो जाती है, जिंदगी और भी नरक बन जाती है, ये सब काम बेहोश मन के परिणाम हैं।
इसलिए हर इंसान परेशान है क्योंकि वो बगैर होश के, इस मन के खेल को खेल रहा है। और ये मन का कोई आदि-अंत नहीं है। अगर होश नहीं रहा तो ये बिना लगाम घोड़े की तरह किसी भी दिशा में ले जा सकता है, और कहीं भी पटक सकता है।
मन एक औजार है मनुष्य के पास, ओर इसका बेहतर से बेहतर उपयोग किया जा सकता है।
- अंत में यही बात के साथ कि आप जो भी करें इस मन से, साथ में होश को संभाल कर रखें ताकि ये मन आपके काबू में हो, कंट्रोल में हो और आप इससे जो चाहें वो करा सकते हैं।