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उत्तराखंड,  नैनीताल

हल्द्वानी बचीधर्मा गाँव – क्या हाथी मारा गया ?

उत्तराखंड में पिछले 5 सालो में कुल 171 हाथीयों की मौत हुई , जबकि इस साल अक्टूबर तक 22 हाथीयों की मौत हो चुकी है , 2019 में 24 हाथीयों की मौत हुई , समूचे उत्तराखंड में जहां जहां पर एलिफेंट कॉरिडोर है , उन्ही क्षेत्रों में हाथियों की अक्सर मौत होती है ,और उसके बाद आरोपी प्रत्यारोप का दौर चलता है जांच विठाई जाती है फिर मामला खत्म हो जाता है , बेजुबान मारा जाता है और किसी को कोई फर्क नही पड़ता , ग्रामीण इलाके के लोग भी हाथियों के उत्पात से बचने के लिए खेतों में करंट या अन्य तरीके अपनाते हैं जिससे उनकी फसल बची रहे , हल्दूचौड़ क्षेत्र में मारे गए हाथी के लिए विद्युत विभाग जिम्मेदार है क्योंकि उन्हें बार बार हाईटेंशन तार को ठीक करने की शिकायत ग्रामीणों द्वारा की गई थी ।

आंकड़ों की बात करें तो 2015 से अब तक 45 लोग हाथीयो के हमले में अपनी जान गंवा चुके हैं ,इनमे 8 की मौत इसी वर्ष अब तक हुई है , कुमाऊं में हल्दूचौड़ से नगला के बीच हाथीयों का मार्ग रहा है ,रामपुर काठगोदाम हाइवे बनने के दौरान दो जगह अंडर पास बनने की बात हुई थी ताकि जंगली जानवर वहां से गुजर सकें लेकिन वो योजना धरातल पर नहीं उतर सकी ।
हल्दूचौड़ और लालकुआं के बीच हाथी कौरीडोर है , आज भी हाथी कॉर्बेट , फतेहपुर के जंगल से होते हुये हाइवे पार कर गौला  नदी से चोरगलिया के जंगलों तक आते जाते है , लेकिन जनसंख्या बढ़ने के साथ साथ इंसान का वनो पर हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है , परिणाम स्वरूप वन्य जीव और मानव संघर्ष दिख रहा है जिसमे कभी वन्य प्राणी तो कभी इंसान मर रहा है ।
समय रहते इस समस्या को नही सुलझाया गया तो वन्य जीव मानव संघर्ष बढ़ता जाएगा और कुछ न कुछ नुकसान की खबरों से हमें दो चार होना ही पड़ेगा ।

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