उद्यान निदेशालय को दून शिफ्ट करने की योजना
रानीखेत (अल्मोड़ा)। उद्यान निदेशालय को चौबटिया से देहरादून शिफ्ट करने की कवायद चल रही है। इसके लिए बाकायदा प्रभारी निदेशक ने उद्यान सचिव को पत्र भेजा है और दूरी का हवाला देते हुए नियमित रूप से शासन स्तर की बैठक में शामिल नहीं होने समेत कई वजहें गिनाते हुए उद्यान निदेशालय को देहरादून स्थानांतरित करने की बात कही है। ऐसे में पहाड़ के औद्योगिक विकास की परिकल्पना कैसे साकार होगी।
उद्यान निदेशालय की स्थापना को 67 साल हो चुके हैं लेकिन आज तक ठोस उद्यान नीति नहीं बन पाई है। आधुनिक शोध और तकनीकों का लाभ तक किसानों को नहीं पहुंच पाता। राज्य बनने के बाद निदेशालय के दिन बहुरने की उम्मीद थी पर हुआ उल्टा। इस दौरान बने अधिकांश निदेशक अपना कार्यकाल तक पूरा नहीं कर पाए हैं। पिछले कई वर्षों से निदेशकों ने भी यहां नियमित रूप से बैठना बंद कर दिया है। इसके चलते कर्मचारियों को फाइलें लेकर देहरादून तक की दौड़ लगानी पड़ती है। ऐसे में आप खुद ही समझ सकते हैं कि औद्यानिकी का कितना विकास हुआ होगा।
अब उद्यान निदेशक ने तो उद्यान सचिव को पत्र लिखकर उद्यान निदेशालय को ही देहरादून स्थानांतरित करने की बात कह दी है। इसके पीछे प्रभारी निदेशक डॉ. रामविलास यादव ने कई कारण भी गिनाए हैं। जैसे देहरादून से रानीखेत की दूरी 450 किमी है और शासन स्तर की बैठकों, न्यायालय संबंधी कार्य निपटाने और शासन की सूचनाओं आदि के लिए निदेशक सहित तमाम अधिकारी कर्मचारियों को देहरादून आना पड़ता है, जिसमें अत्यधिक व्यय भी होता है। कहा कि ऐसी परिस्थितियों में निदेशालय को चौबटिया में रखना व्यावहारिक नहीं है। कृषि विभाग और अन्य रेखीय विभागों के मुख्यालय देहरादून में स्थापित हैं। गत वर्ष सहकारिता विभाग का निदेशालय भी अल्मोड़ा से देहरादून स्थानांतरित हुआ है। कहा कि चौबटिया समुद्रतल से 6600 फीट की ऊंचाई पर है और यहां दिसंबर से फरवरी तक बर्फबारी होती है। ऐसे में आवागमन और दूरसंचार बाधित होने से विभागीय कार्यों पर असर पड़ता है।
यूपी के पहले मुख्यमंत्री पं. गोविंद बल्लभ पंत ने पृथक निदेशालय की चौबटिया में स्थापना कराई थी। यही सोच थी कि उद्यमियों, काश्तकारों के जीवन में औद्यानिकी के क्षेत्र में कई परिवर्तन होंगे। निदेशालय बनने के बाद काश्तकारों को इसका लाभ भी मिला। 1953 में निदेशालय के विक्टर साने निदेशक बने। उन्होंने पर्वतीय क्षेत्र में शीतोष्ण फल प्रजातियों के साथ घाटियों में आम और मसाला, सब्जी, शहद, पुष्प आदि के उत्पादन की नीतियां बनाईं। 1958 में आनंद प्रकाश गुप्ता और देवकी नंदन श्रीवास्तव ने विभाग का नेतृत्व किया। 1984 तक उद्यान विशेषज्ञ डॉ. शिवराज सिंह तेवतिया ने विकास और शोध कार्यक्रमों के बीच तालमेल स्थापित करते हुए उद्यान को गति प्रदान की। 1989 में डॉ. जेएन सेठ को निदेशक बनाया गया। उन्होंने स्थानीय भूगोल और जलवायु के मुताबिक स्थानीय प्रजातियों को विकसित करने का प्रयास किया।
1991 के बाद निराशाजनक दौर शुरू हुआ जो आज तक जारी है।